ढाका में हालांकि बंगलादेश ने एक बार फिर भारत को उलटफेर का शिकार बना दिया है, लेकिन यह मैच क्रिकेट के महानायक सचिन के सौंवे शतक के लिए इतिहास में याद रखा जाएगा । सचिन इस मैच में अस्सी का आंकड़ा पार करने के बाद तनाव में थे । वे अपने सामान्य खेल से कुछ धीमा भी खेले , लेकिन इस बार उन्होंने मंजिल हासिल कर ही ली ।इस एवरेस्ट जैसे रिकार्ड को फतेह करने में न जाने अब कितना समय लगेगा । निकट भविष्य में तो इसकी कोई संभावना नहीं क्योंकि नम्बर दो पर चल रहे रिक्की पोंटिंग सिर्फ 71 शतक ही लगा पाए हैं और उनका करियर भी बहुत लम्बा नहीं है । आस्ट्रेलिया की एकदिवसीय टीम से उनकी छुट्टी हो ही चुकी है । टेस्ट भी वे दो-तीन साल से ज्यादा नहीं खेल पाएंगे । ऐसे में वे इस रिकार्ड को नहीं तोड़ सकते । नई पीढ़ी में कौन इस शिखर पर पहुंचेगा यह तो समय ही बताएगा, लेकिन फिलहाल यह असंभव नजर आ रहा है । यह असंभव इसलिए भी नजर आ रहा है क्योंकि सचिन जैसे खिलाडी कभी-कभार ही हो पाते हैं , वे सचमुच में इस खेल के महानायक हैं।
सचिन और अन्य सीनियर खिलाडियों से पिछले कुछ समय से लगातार एक प्रश्न पूछा जा रहा है कि वे कब सन्यास लेंगे । द्रविड़ ने अपना बल्ला टांग दिया है । निश्चित रूप से अब बारी सचिन की है । सचिन कब सन्यास लेंगे यह तो सचिन ही बताएंगे लेकिन मेरा मानना है कि सचिन को इस एशिया कप के बाद एक दिवसीय क्रिकेट से सन्यास ले लेना चाहिए । द्रविड़ के जाने के बाद टेस्ट मैचों में सचिन की जिम्मेदारी बढ़ गई है । जब तक नए खिलाडी द्रविड़ द्वारा खाली की गई जगह पर अपनी दावेदारी पक्की करेंगे तब तक सचिन को टीम का हिस्सा बना रहना चाहिए यानि कम से कम दो साल और सचिन को टेस्ट क्रिकेट खेलना चाहिए और इसके लिए एक दिवसीय क्रिकेट से सन्यास आवश्यक हो गया है । वैसे भी बोर्ड उन्हें बार-बार आराम दे ही रहा है । एकदिवसीय टीम में अगले विश्व कप हेतु युवा खिलाडियों को ज्यादा-से ज्यादा मैच खिलाए जाने चाहिए । निश्चित रूप से सचिन को टीम से निकाला नहीं जा सकता और वे जब तक चाहेंगे तब तक खेलेंगे लेकिन एकदिवसीय क्रिकेट से उनका अब जाना शीघ्र ही होने वाला है यदि टीम इण्डिया एशिया कप जीतती है तो यह एक उपयुक्त समय हो सकता है क्रिकेट के इस प्रारूप को अलविदा कहने का ।
फिलहाल बात करते हैं सचिन के सभी 100 शतकों की, यह आंकड़े नवभारत टाइम्स से साभार लिए गए हैं ---------
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द्रविड़ का क्रिकेट के सभी संस्करणों से सन्यास एक युग के अंत जैसा है । द्रविड़ अपनी शैली , खेल भावना और बेजोड़ प्रतिभा के लिए आने वाले क्रिकेटरों के लिए सदा प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे । द्रविड़ एक दिवसीय टीम से काफी समय पहले बाहर हो चुके थे, लेकिन इंग्लैण्ड के कठिन दौरे को देखते हुए उन्हें टीम में रखा गया और उन्होंने तुरंत घोषणा कर दी कि वह अंतिम एक दिवसीय श्रृंखला खेलेंगे । अंतराष्ट्रीय टी-20 से तो वे पहले विश्व कप के समय से ही खुद को अलग कर चुके थे । द्रविड़ पिछले कुछ समय से टेस्ट टीम के ही सदस्य थे और उनके बिना वर्तमान टेस्ट टीम की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी । इंग्लैण्ड में वे अकेले इंग्लैण्ड के गेंदबाजों से लोहा लेते रहे ।नम्बर तीन के बल्लेबाज होते हुए वे ऐसे ओपनर बने जो शरू से लेकर अंत तक नाबाद रहा । उस समय तक यह कल्पना नहीं की जा सकती थी की वे टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह देंगे लेकिन आस्ट्रेलिया के खराब दौरे के बाद उन्होंने बल्ले को टांग देना ही उचित समझा । अगर वे किसी श्रृंखला की शुरुआत में अपने सन्यास की घोषणा करते तो उनके अंतिम टेस्ट को यादगार बनाया जा सकता था लेकिन द्रविड़ की अपनी अलग ही सोच रही । दरअसल वे पूरे करियर में अलग ही तरह की शख्सियत रहे । सचिन गांगुली के दौर में होने के कारण वे उतने सुर्ख़ियों में नहीं रहे जितने के वे हकदार थे । उनकी कोई कमाल की पारी लक्ष्मण की पारी के आगे दब गई, कोई गांगुली की पारी के आगे दब गई तो कोई सचिन की पारी के आगे लेकिन बड़ी संझेदारियों में उनका रहना उनकी योग्यता दर्शाने के लिए काफी है । 2007 में भारत विश्व कप के फाइनल में खेला । निस्संदेह वह गांगुली की कमाल की कप्तानी थी जिसने विदेशी धरती पर टीम को जुझारू बनाया था लेकिन उस विश्व कप में द्रविड़ के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता । भारत के पास धोनी से पहले कभी भी विकेटकीपर के रूप में अच्छा बल्लेबाज नहीं रहा परिणाम स्वरूप एक बल्लेबाज कम हो जाता था । विश्व कप में द्रविड़ ने विकेट कीपिंग की जिससे टीम को अतिरिक्त बल्लेबाज रखने का अवसर मिला परिणाम स्वरूप द. अफ्रीका की तेज पिचों पर भारतीय टीम फाइनल खेली । टीम के हित के लिए कीपिंग करना टेस्ट में पारी को ओपन करना उनकी खेल भावना को दर्शाता है । उनकी तकनीक का तो कोई सानी है ही नही तभी तो वो दीवार कहलाए । भारतीय क्रिकेट को उनके जाने पर काफी क्षति हुई जो भरने में पता नहीं कितना समय लगेगा क्योंकि अभी तक गांगुली द्वारा खाली किया स्थान भी पूरी तरह से नहीं भरा गया । गांगुली नम्बर पांच पर खेलते थे और इस स्थान के लिए खिलाए खिलाडियों में युवराज , रैना , रोहित कोई भी स्थायी नहीं हो पाया । द्रविड़ की जगह भरने के लिए सबकी नजरें कोहली पर हैं लेकिन वो कितना खरा उतरते हैं वह भविष्य ही बताएगा । फिलहाल तो टीम को उनकी कमी बेहद खलेगी ।
द्रविड़ आंकड़ों में
त्रिकोणीय श्रृंखला में भारतीय टीम का प्रदर्शन अभी तक अच्छा कहा जा सकता है । चार मैचों में दो जीत, एक टाई और एक हार के आधार पर कहा जा सकता है कि भारतीय टीम फाइनल में पहुंचने की प्रबल दावेदार है । भारतीय टीम ने आस्ट्रेलिया और श्रीलंका दोनों के खिलाफ अंतिम दो मैच बड़े करीबी खेले । आस्ट्रेलिया को हराने में सफलता मिली, लेकिन श्रीलंका के खिलाफ ऐसा नहीं हो पाया ।
भारत श्रीलंका के खिलाफ एक समय सुखद स्थिति में था । अंतिम दस ओवरों में सिर्फ उनसठ रन चाहिए थे यानि प्रति बाल एक रन । इसके बाद के चार ओवरों में हमने आठ रन बनाए । परिणामस्वरूप अंतिम तीन ओवरों में लगभग दस की औसत आ गई । नजदीकी मैच किसी भी तरफ जा सकते हैं । आस्ट्रेलिया के खिलाफ भी यदि नो बाल न मिलती तो परिणाम कुछ और हो सकता था । यह ठीक है कि जब विकेट गिरते हैं तब विकेट बचाना ज्यादा जरूरी हो जाता है, लेकिन तीन-चार सिंगल तो निकलने ही चाहिए, इसके विपरीत हमने 41 वां ओवर मेडन निकाला और एक विकेट भी रन आउट के रूप में गंवाया ।गंभीर और इरफ़ान का रन आउट होना काफी हद तक महंगा साबित हुआ । इरफ़ान का रन आउट होना तो बिलकुल मूर्खतापूर्ण था, क्योंकि वहां रन की संभावना थी ही नहीं । धोनी मूर्खतापूर्ण तरीके से दौड़े । कप्तान की विकेट बचाने के लिए इरफ़ान को बली देनी ही पड़ी । इरफ़ान छ्क्का लगा चुके थे, उन पर विश्वास किया जा सकता था कि स्ट्राइक पर रहने पर वे शाट लगा सकते हैं, जबकि विनय कुमार के आने के बाद एक छोर से बड़े शाट लगने की संभावना समाप्त हो गई । यही कारण था कि अंतिम ओवर में ९ रन बनाकर भारत जीत न सका, जबकि इरफ़ान और धोनी के रहते यह लक्ष्य आसानी से हासिल किया जा सकता था ।
श्रीलंका के लिए जीत ज्यादा जरूरी थी और इस मैच के साथ उसकी फाइनल में संभावना क्षीण हुई है । अब उसे कम-से-कम भारत को दोनों मैच हराने होंगे । भारत की स्थिति अच्छी है । भारत को मिडल ऑर्डर में फेरबदल करना चाहिए । रैना , रोहित और मनोज तिवारी में भी उसी तरह से रोटेशन प्रणाली अपनाई जानी चाहिए जैसे कि सचिन, सहवाग और गंभीर में अपने जा रही है ।
भारतीय टीम को गलतियों पर ध्यान देते हुए सुधार के प्रयास जारी रखने होंगे । भारतीय टीम पिछली त्रिकोणीय श्रृंखला की विजेता है और वे इस बार भी विजेता हो सकते हैं । जरूरत है तो मजबूत इरादों की ।
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